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Saturday, December 20, 2014

अपनी लहू कर नहीं सकते अदा


जब जीवन उसने दिया
उसे लेने वाले हम हे कौन
नन्हीं कलियाँ तो खुसियां बिखेरते हैं
उन्हे मरोडनेवाले हम है कौन

क़त्ल क्यों कर आया उन मासूमों की
जिनकी ना तो कुच्छ खता थी
ना हेबानियत से कुच्छ नाता
पर चढ़ गये बलि बिना कीसी कारण के
ये नाइंसाफी देख रहा है वो खुदा
भुला हुआ इंसान को इंसानियत सिखादे हे मालिक
अब हर दिन दूसरों की खुसी केलिये अपनी लहू कर नहीं सकते अदा । 

महाप्रसाद मिश्रा 

Tuesday, September 9, 2014

क्या पता क्या हुआ मुझे (इक खत उसके नाम)

क्या पता क्या हुआ मुझे
अच्छा भला था पागल हुआ मैं
तुझे देखा तो एक खूबसूरत चाहत खिला मन मैं
क्या पता क्या हुआ मुझे
अच्छा भला था पागल हुआ मैं।

दिन तो गया ही गया 
रातों को भी अब चैन नहीं
अकेले बैठे हुये तेरी याद मैं खोया मैं
आंखे है खूली फिर भी सोया हूँ मैं
क्या पता क्या हुआ मुझे
अच्छा भला था पागल हुआ मैं।

आज तक कभी ऐसा हुआ न था
जैसे इक पल मे सारा जहां भूला मैं
कभी ना गीत सुनने वाला 
आज गज़ल सुनने लगा मैं
क्या पता क्या हुआ मुझे
अच्छा भला था पागल हुआ मैं।

तेरे आने से जैसे चारो तरफ मेहक सा गया
तू गुजरी वो दूर से, लेकिन दिल मेरा इधर झूम सा गया
हाये, आँख झुकाके वो चलना तेरा
जब देखा, ये दिल मेरा प्यार का नया गीत लिखता गया...
लगता है जैसे इक पल मैं बदल गयी ज़िंदगी,
और बदल गया मैं...
क्या पता क्या हुआ मुझे
अच्छा भला था पागल हुआ मैं।

एक दिन देखा नहीं तुझे तो दिल जैसे तड़प ने लगा
मन बेकरार ओर आँखें बेचैन होने लगा
सोचा आज मिलेगी तो दिल की बातें बयान करूंगा मैं
आई ही नहीं तू, इसीलिये ये खत लिख रहा हूँ मै
समझ ही जाना,
इक खत वापस आया तो ज़िंदगी संवर जायेगी मेरी
और “ हम ” बनजायेगा ये अकेला ओर तन्हा “ मैं ”
अगर जवाब आया नहीं तो सोच लूंगा
क्या पता कुच्छ हुआ था मुझे
अच्छा भला था कभी पागल हुआ था मैं
तेरी खुशियों के लिये दुआ करूंगा
सारी यादें लिये तेरी ज़िंदगी से चला जाऊँगा मैं !!!



महाप्रसाद मिश्रा

Monday, September 8, 2014

ज़रूरत

ज़रूरत नहीं होती तो कोई दरवाज़ा भी ना खट खटाता
ज़रूरत नहीं होती तो आज के ज़माने मैं कोई बात भी नहीं करता
कहाँ गया वो भाईचारा, वो अपना पन का नारा
क्या आज के दिन मैं यॅ सब दिखावा बन गया है....?
ये सारे लब्ज़ आज ज़रूरतो के आगे घूटने टेक रहे है
और अपनी मानसिकता एसी होगयी है
की हम अपनो को छोड़ के पैसों से खुसियां समेट रहे हैं !!!

महाप्रसाद मिश्रा 

Sunday, August 3, 2014

अपनी मीटी छोड कर बाहर रहना हैं हमे...

अपनी मीटी छोड कर बाहर रहना हैं हमे...
घर की याद नहीं... पैसे केलिये काम करना हैं हमे
इतना तो कभी सोचा होता... की कोई वहाँ इंतज़ार मैं हैं
घूम आना सारी दूनिया...
मगर याद रखना मरना तो अपनी मीटी मैं है...

महप्रसाद मिश्रा

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