Saturday, November 1, 2014

कुच्छ वो बातें मेरे कलम से ...

अकेला था बैठा
दिल से आवाज आया
आज तक हसा तो कोई ना देख पाया
आज तक हसा तो कोई ना देख पाया
हुआ खामोश आज तो सब की नज़र मैं आया
 
जब हो रही बारिश तभी चुपके से आसूं बाहर आया
इस्से मैं किस्मत कहूँ या मेरी तक़दीर
इससे मैं किस्मत कहूँ या मेरी तक़दीर 
जब पेहना इंसानियत का चस्मा 
तभी दुनिया काला ही नज़र आया...
 
पर फिर भी दिल ने ना मानी मेरी बात
ओर मुझे समझाने को आया 
की भाई मेरे, ये असूल है इस युग का 
जो दूसरो के लिये सोचा, वो खुद केलिये कुच्छ ना करपाया 
सायद आया है तू इसी केलिए, तो ना देख दुनिया काला है या सफेद
कर हिम्मत, आगे बढ, किसीसे ना कर प्रभेद
जो उपर बैठा है वो देखा रहा है
तेरे बारे मैं भी कुच्छ सोच रहा है...
सोचना उससे और करना तुझे है...
असफल हो जाएगा ये जीवन तेरा
अगर तूने उसकी आशीर्वाद को ठुकराया
अफ़सोश रहेगा की इंसान होते हुए भी तू अगर कुच्छ ना करपाया...
 
भगबान पे भरोशा रखिये (Believe in God)

महाप्रसाद मिश्रा

Monday, October 27, 2014

छोड़ आये थे जो वो गलियाँ...

छोड़ आये थे जो वो गलियाँ
मूड कर देख रहे हैं आज जिसे
गलियाँ है तो वही ...
पर लोग है नये
ये तो समय का वो चक्र है...
जिस मे जाने नजाने कितने आये ओर कितने गये।

अब, वो पुराने लोगों से मिलने की आस है
मगर सोच रहा अब समय किस के पास है
वो कीमती वक़्त जो उनके साथ गुजर गया
वो तो अब  नहीं सकता ...
लेकिन जब मिलता हूँ दोस्तों से या करता हूँ बातें
अब सिर्फ वही पल खुसी है ओर वही पल खास है !!!

महाप्रसाद मिश्रा
(जीवन खूबसूरत है।)  

Sunday, September 28, 2014

सीने मैं क़ैद है... वो दर्द इस तरह...

सीने मैं क़ैद है वो दर्द इस तरह... जैसे चारो तरफ सीशे मैं क़ैद हे एक छबी जिस तरह !!!

महप्रसाद मिश्रा

Tuesday, September 9, 2014

क्या पता क्या हुआ मुझे (इक खत उसके नाम)

क्या पता क्या हुआ मुझे
अच्छा भला था पागल हुआ मैं
तुझे देखा तो एक खूबसूरत चाहत खिला मन मैं
क्या पता क्या हुआ मुझे
अच्छा भला था पागल हुआ मैं।

दिन तो गया ही गया 
रातों को भी अब चैन नहीं
अकेले बैठे हुये तेरी याद मैं खोया मैं
आंखे है खूली फिर भी सोया हूँ मैं
क्या पता क्या हुआ मुझे
अच्छा भला था पागल हुआ मैं।

आज तक कभी ऐसा हुआ न था
जैसे इक पल मे सारा जहां भूला मैं
कभी ना गीत सुनने वाला 
आज गज़ल सुनने लगा मैं
क्या पता क्या हुआ मुझे
अच्छा भला था पागल हुआ मैं।

तेरे आने से जैसे चारो तरफ मेहक सा गया
तू गुजरी वो दूर से, लेकिन दिल मेरा इधर झूम सा गया
हाये, आँख झुकाके वो चलना तेरा
जब देखा, ये दिल मेरा प्यार का नया गीत लिखता गया...
लगता है जैसे इक पल मैं बदल गयी ज़िंदगी,
और बदल गया मैं...
क्या पता क्या हुआ मुझे
अच्छा भला था पागल हुआ मैं।

एक दिन देखा नहीं तुझे तो दिल जैसे तड़प ने लगा
मन बेकरार ओर आँखें बेचैन होने लगा
सोचा आज मिलेगी तो दिल की बातें बयान करूंगा मैं
आई ही नहीं तू, इसीलिये ये खत लिख रहा हूँ मै
समझ ही जाना,
इक खत वापस आया तो ज़िंदगी संवर जायेगी मेरी
और “ हम ” बनजायेगा ये अकेला ओर तन्हा “ मैं ”
अगर जवाब आया नहीं तो सोच लूंगा
क्या पता कुच्छ हुआ था मुझे
अच्छा भला था कभी पागल हुआ था मैं
तेरी खुशियों के लिये दुआ करूंगा
सारी यादें लिये तेरी ज़िंदगी से चला जाऊँगा मैं !!!



महाप्रसाद मिश्रा

Monday, September 8, 2014

ज़रूरत

ज़रूरत नहीं होती तो कोई दरवाज़ा भी ना खट खटाता
ज़रूरत नहीं होती तो आज के ज़माने मैं कोई बात भी नहीं करता
कहाँ गया वो भाईचारा, वो अपना पन का नारा
क्या आज के दिन मैं यॅ सब दिखावा बन गया है....?
ये सारे लब्ज़ आज ज़रूरतो के आगे घूटने टेक रहे है
और अपनी मानसिकता एसी होगयी है
की हम अपनो को छोड़ के पैसों से खुसियां समेट रहे हैं !!!

महाप्रसाद मिश्रा 

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